SACRED GAMES 2: 'सेक्रेड गेम्स' की वीभत्स होती दुनिया बचाने लायक है या नहीं?

'अहम् ब्रह्मास्मि. मैं ब्रह्म की धूल हूं. मैं सबसे प्रेम करता हूं. मैं किसी से प्रेम नहीं करता. मैं अघोरी हूं. मैं मुर्दा खाकर जीवित रह सकता हूं. मैंने बार-बार अपने पिता, अपने पुत्र, पत्नी और मां का वध किया है. मैं कलयुग का पुत्र कली हूं. दानव का पुत्र, अधर्म का पिता. मैं कल्कि भी हूं. मैं परम हूं. मैं अणु हूं. मैं वीभत्स हूं. मैं भीषण हूं. मैं ब्रह्म हूं. सिर्फ़ मैं ही ब्रह्म हूं.'
अपनी स्मृति को खंगालकर बताइए कि बीते दिनों आपने सबसे वीभत्स क्या देखा था?
मॉब लिंचिंग का कोई वायरल वीडियो. बलात्कार की विस्तृत जानकारी देती कोई ख़बर. नंगी पीठों को छीलती हुई कोई ताकतवर बेल्ट. गटर में उतरता कोई आदमी. तीन साल की बच्ची का 'धर्म की वजह से' रेप. किसी समंदर तट पर औंधे मुंह पड़ा कोई नन्हा शव या नदी में मां का डुबाकर मारा कोई बच्चा. किसी पेलेट गन का शिकार हुई हरे रंग की कोई आंख या फ़ौजी पिता की चिता के सामने रोती बिटिया.
इन सब या इससे इतर किसी भी वीभत्स चीज़ को देखकर आपने ख़ुद से क्या सवाल किया- ये दुनिया को क्या हो गया है? या 'ये दुनिया कल ख़त्म होनी है, आज ख़त्म हो जाए.'
ऑनलाइन स्ट्रीमिंग वेबसाइट नेटफ़्लिक्स की सिरीज़ 'सेक्रेड गेम्स' का दूसरा सीज़न इसी सवाल के साथ आगे बढ़ता है. जवाब कौन देगा? क्योंकि जवाब 'आपसे, मुझसे...सबसे बड़ा है.'
भूख से तड़प रहे लोगों के सामने अचानक 56 भोग रख दें तो उनके अंदर धँसते पेट, बाहर निकलते फेफड़े दिखने बंद नहीं होते.
भूखों के सामने एक साथ कई सारे पकवान परोसे जाएंगे तो वो उल्टी कर देगा या कंफ्यूज़ हो जाएगा. ख़ासतौर पर तब जब ये भूख भी खाना परोसने वाले ने ही पैदा की हो.
'सेक्रेड गेम्स-2' की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. स्कूल जाने वाले बच्चे के बस्ते में विज्ञान, नैतिक शिक्षा, पुराण, मनुस्मृति, जेनोसाइड, वर्महोल, 'गॉड इज डेड' वाले दार्शनिक फेडरिक नीत्शे और ओशो की 'संभोग से समाधि' किताब रख दी गई है.
इस स्कूल जाने वाले बच्चे को गणेश गायतोंडे (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) की समझाई भदेस बात तो पसंद आती है. लेकिन गुरुजी (पंकज त्रिपाठी) के ज़रिए निहिलिज्म, अमीबा, अणु, न्यूक्लियर एनर्जी और समय चक्र समझाने की कोशिश दार्शनिकता का 'दूर-दर्शन' जान पड़ती है. इन सबके बीच ठहरने की चाह में ये स्कूली बच्चा सरताज (सैफ़ अली ख़ान) की तरह भागता रहता है.
ये सब एक बार में समझने की उम्मीद उस पब्लिक से की गई है, जो रियल में भी बिना डिस्कलेमर वाले रील देखने की आदी है.
उन्नाव केस, मॉब लिंचिंग, गोरक्षा, बलात्कार, लव जिहाद, नो वन किल्ड पहलू ख़ान, देशभक्ति, सेक्युलर- एक गाली?
'सब अपना क़िस्सा लेकर आए हैं. अपुन का काम है, उसको जोड़ना.' पहले सीज़न की ताक़त रहा ये डायलॉग दूसरे सीज़न की कमी जान पड़ता है. लेकिन क्या ये वाक़ई कमी है?
सेक्रेड गेम्स-2 शायद उम्मीदों का शिकार है. ये उम्मीदें दोतरफ़ा हैं. सेक्रेड गेम्स बनाने वालों की भी और देखने वालों की भी. बनाने वालों ने शायद सोचा कि पहले सीज़न में 'अतापि-वतापि' का कॉन्सेप्ट समझ चुके लोग नेक्स्ट लेवल के लिए तैयार हैं. देखने वालों को लगा कि सारे कॉन्सेप्ट समझना 'कुकू का जादू' नहीं है कि सब पर चल जाए.
लेकिन अगर इस 'जादू' को एक छड़ी में बांधकर चलाया जाए तो क्या रील और रियल के बीच जो सच है, वो समझ आ सकता है? आइए आप और 'अपुन' कोशिश करते हैं.
'सर्वशक्तिशाली इकलौते भगवान' गणेश गायतोंडे के टूटते मंदिर. ठहरने की चाहत में भागता सरताज. बलिदान लेने की ओर बढ़ते चतुर्वेदी वंश के 'अवतार' गुरुजी. फ़ैसले लेने वाली ताक़तवर औरतें जोजो, यादवजी, बत्या.
'नहीं समझ में आता है न, कहानी किधर जाएगा?' तो कहानी एकदम ताज़ा घटनाओं से शुरू करिए.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का बयान, "नरेंद्र मोदी आप इस क़ौम को ग़ुलाम नहीं बना सकेंगे. आपकी ईंट का जवाब पत्थर से देंगे. वक़्त आ गया है जब हम आपको सबक़ सिखाएंगे."
भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान,"भारत न्यूक्लियर हथियारों के 'पहले इस्तेमाल न' करने की नीति पर अभी भी कायम है लेकिन भविष्य में क्या होता है यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है."
'सेक्रेड गेम्स' वाले गुरुजी का बयान,"भारत और पाकिस्तान. दुनिया का सबसे पुराना संघर्ष. ये देशों या धर्मों का नहीं, सभ्यताओं का युद्ध है. न्यूक्लियर से आए थे... न्यूक्लियर में जाएंगे."
अब न्यूक्लियर हथियारों और युद्ध को लेकर रील और रियल के इन बयानों पर ग़ौर कीजिए.
ऐसे वक़्त में जब भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद की जड़ रहे कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाला अनुच्छेद 370 ख़त्म किया जा चुका है. बलिदान देने की बातें देश के नेता आए दिन करते ही हैं.
तब गुरुजी का ये कहना कि 'बलिदान देना होगा...' सच के ज़्यादा क़रीब लगता है.
'एक ट्रिगर चाहिए होता है और बन जाती है नई दुनिया. ग्लोबल वॉर्मिंग के नाम पर फ़र्स्ट वर्ल्ड वाले झगड़े. हज़ारों पटाखों पर लड़ियां बिछी पड़ी हैं. कहीं भी सुलगा दो और सब धुआं-धुआं.'
संसद की स्टाइल से अगर इस बात की सत्यता जांचनी हो तो यूं जांची जा सकती है!
जो फेवर में हैं वो बोलें- AYES. जो विरोध में हैं वो बोलें-

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